आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी
सम्पादक/पत्रकार द्विवेदी
पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी ने सन् 1903 ई. से 1920 ई. तक सरस्वती पत्रिका सम्पादन किया था। उनके सम्पादन-काल में ’सरस्वती‘ निरन्तर उन्नतिशील रही। ’सरस्वती‘ का महत्त्व तीन दृष्टियों से है। एक तो इसके माध्यम से हिन्दी-भाषा का परिष्कार हुआ और हिन्दी की वाक्य-रचना एवं पदविन्यास में एकरूपता लाने की चेष्टा की गयी; दूसरे, इसकी प्रेरणा से हिन्दी में अनेक लेखक और कवि प्रतिष्ठित हुए। तीसरे, इसी के माध्यम से हिन्दी की नवीन गद्य-विधाओं के विकास का पथ प्रशस्त हुआ। यह अवश्य है कि ’सरस्वती‘ के प्रकाशन के पूर्व कई महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई थीं और ’सरस्वती‘ के माध्यम से जो सम्पादन का आदर्श-प्रतिष्ठित हुआ वह परम्परागत आदर्शों का ही उन्नयन था, किन्तु जिस निष्ठा से द्विवेदीजी सम्पादन-कार्य में लगे हुए थे, वह अन्यत्र दुर्लभ थी। द्विवेदीजी की एकान्तनिष्ठा के कारण ही ’सरस्वती‘ में व्यक्तित्व और प्राणवत्ता की झलक मिलती थी। इस सम्बन्ध में पराड़करजी जैसे पत्रकार ने लिखा है - “सन् 1906 ई. से जब मैंने स्वयं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया, प्रतिमास ’सरस्वती‘ का अध्ययन करना मेरा एक कर्तव्य हो गया। मैं ’सरस्वती‘ देखा करता था, सम्पादन सीखने के लिए। ग् ग् ग् ’सरस्वती‘ का प्रत्येक अंक एक सर्वाङ्गपूर्ण चित्र मालूम होता था।” पराड़करजी ने ये उद्गार पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी के प्रति अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते हुए व्यक्त किये थे। इसलिए इसमें श्रद्धातिरके भी हो सकता है, किन्तु इसके मूल में महत्त्व की सहज स्वीकृति भी है; इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। 1920 ई. में द्विवेदीजी ’सरस्वती‘ से अलग हुए और उनके साथ ही ’सरस्वती‘ का प्रभाव भी क्रमशः क्षीण होता गया। द्विवेदीजी के साहित्यिक व्यक्तित्व मंे सम्पादक का रूप ही सर्वोपरि है। उनकी सम्पादन-कला की समस्त विशेषताओं को लक्ष्य करते हुए डाॅ. उदयभानु सिंह ने लिखा है -
“जनवरी 1903 ई. में द्विवेदीजी ने सम्पादन आरम्भ किया। पत्रिका के अंग-अंग में उनकी प्रतिभा की झलक दिखलाई पड़ी। विषयों की अनेकरूपता, वस्तुयोजना, सम्पादकीय टिप्पणियों, पुस्तक-परीक्षा, चित्रों, चित्र-परिचय, साहित्य-समाचार के व्यंग्यचित्रों, मरोजञ्जक सामग्री, बाल-वनितोपयोगी रचनाओं, प्रारम्भिक विषय-सूची, प्रूफ-संशोधन और पर्यवेक्षण में सर्वत्र ही सम्पादन-कला-विशारद द्विवेदी का व्यक्तित्व चमक उठा।” ”सम्पादक द्विवेदी के विषय में इतना ही कहना बस है कि ’सरस्वती‘ बीसवीं शती के प्रथम दो दशकों की साहित्यिक गति-विधि की नियामिका बन गयी थी। सम्पादन-कला द्विवेदीजी के लिए जीवन-यापन का साधन नहीं, जीवन-साधना थी। इसीलिए सम-सामयिक पत्र-पत्रिकाओं की उस अंधकारमयी रजनी में वह अपनी अप्रतिहत प्रभा से चमकनेवाली एक ही ध्रुवतारिका थी।” डाॅ. सिंह की उपर्युक्त प्रशस्ति को नीचे उद्धृत कुछ महत्त्वपूर्ण आत्मस्वीकृतियों से पूरा-पूरा समर्थन मिल जाता है:
- उस समय ’सरस्वती‘ ही एक ऐसी पत्रिका थी, जिसे भारत के सभी प्रान्तों में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। - मैथिलीशरण गुप्त
- उस हिन्दी-हीन प्रान्त में, बिना शिक्षक के ’सरस्वती‘ की प्रतियाँ लेकर पद-साधना की और हिन्दी सीखी थी। - महाकवि ’निराला‘
- अपना 50 प्रतिशत ज्ञान ’सरस्वती‘ से अर्जित किया। - रायकृष्णदास
- किसी भाषा के बारे में किसी एक व्यक्ति और एक पत्रिका ने उतना काम नहीं किया, जितना हिन्दी के बारे में इन दोनों ने किया। - राहुल सांकृत्यायन
- मेरे बाल्य-काल के अतिरिक्त-ज्ञान की एकमात्र साधिका। - बाबू गुलाबराय
- सरस्वती का चिरऋणी हूँ। - वृन्दावनलाल वर्मा
हिन्दी के प्रखर माक्र्सवादी समीक्षक डाॅ. रामविलास शर्मा तो ’सरस्वती‘ को हिन्दी की ’जातीय‘ पत्रिका मानते हैं। उनकी दृष्टि में - “सरस्वती सबसे पहले ज्ञान की पत्रिका थी, वह हिन्दी नवजागरण का मुख पत्र थी और हिन्दी-भाषी जनता की सर्वमान्य जातीय पत्रिका थी। ज्ञान की पत्रिका होने के अलावा वह कलात्मक साहित्य की पत्रिका थी, ऐसे साहित्य की जो रीतिवादी रूढ़ियों का नाश करके नवीन सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रचना जा रहा था। इसलिए उसने हिन्दी-साहित्य में और उसके बाहर व्यापक स्तर पर भारतीय साहित्य में वह प्रतिष्ठा प्राप्त की जो बीसवीं सदी में अन्य किसी पत्रिका को प्राप्त न हुई।”
सम्पादक/पत्रकार द्विवेदी
पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी ने सन् 1903 ई. से 1920 ई. तक सरस्वती पत्रिका सम्पादन किया था। उनके सम्पादन-काल में ’सरस्वती‘ निरन्तर उन्नतिशील रही। ’सरस्वती‘ का महत्त्व तीन दृष्टियों से है। एक तो इसके माध्यम से हिन्दी-भाषा का परिष्कार हुआ और हिन्दी की वाक्य-रचना एवं पदविन्यास में एकरूपता लाने की चेष्टा की गयी; दूसरे, इसकी प्रेरणा से हिन्दी में अनेक लेखक और कवि प्रतिष्ठित हुए। तीसरे, इसी के माध्यम से हिन्दी की नवीन गद्य-विधाओं के विकास का पथ प्रशस्त हुआ। यह अवश्य है कि ’सरस्वती‘ के प्रकाशन के पूर्व कई महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई थीं और ’सरस्वती‘ के माध्यम से जो सम्पादन का आदर्श-प्रतिष्ठित हुआ वह परम्परागत आदर्शों का ही उन्नयन था, किन्तु जिस निष्ठा से द्विवेदीजी सम्पादन-कार्य में लगे हुए थे, वह अन्यत्र दुर्लभ थी। द्विवेदीजी की एकान्तनिष्ठा के कारण ही ’सरस्वती‘ में व्यक्तित्व और प्राणवत्ता की झलक मिलती थी। इस सम्बन्ध में पराड़करजी जैसे पत्रकार ने लिखा है - “सन् 1906 ई. से जब मैंने स्वयं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया, प्रतिमास ’सरस्वती‘ का अध्ययन करना मेरा एक कर्तव्य हो गया। मैं ’सरस्वती‘ देखा करता था, सम्पादन सीखने के लिए। ग् ग् ग् ’सरस्वती‘ का प्रत्येक अंक एक सर्वाङ्गपूर्ण चित्र मालूम होता था।” पराड़करजी ने ये उद्गार पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी के प्रति अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते हुए व्यक्त किये थे। इसलिए इसमें श्रद्धातिरके भी हो सकता है, किन्तु इसके मूल में महत्त्व की सहज स्वीकृति भी है; इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। 1920 ई. में द्विवेदीजी ’सरस्वती‘ से अलग हुए और उनके साथ ही ’सरस्वती‘ का प्रभाव भी क्रमशः क्षीण होता गया। द्विवेदीजी के साहित्यिक व्यक्तित्व मंे सम्पादक का रूप ही सर्वोपरि है। उनकी सम्पादन-कला की समस्त विशेषताओं को लक्ष्य करते हुए डाॅ. उदयभानु सिंह ने लिखा है -
“जनवरी 1903 ई. में द्विवेदीजी ने सम्पादन आरम्भ किया। पत्रिका के अंग-अंग में उनकी प्रतिभा की झलक दिखलाई पड़ी। विषयों की अनेकरूपता, वस्तुयोजना, सम्पादकीय टिप्पणियों, पुस्तक-परीक्षा, चित्रों, चित्र-परिचय, साहित्य-समाचार के व्यंग्यचित्रों, मरोजञ्जक सामग्री, बाल-वनितोपयोगी रचनाओं, प्रारम्भिक विषय-सूची, प्रूफ-संशोधन और पर्यवेक्षण में सर्वत्र ही सम्पादन-कला-विशारद द्विवेदी का व्यक्तित्व चमक उठा।” ”सम्पादक द्विवेदी के विषय में इतना ही कहना बस है कि ’सरस्वती‘ बीसवीं शती के प्रथम दो दशकों की साहित्यिक गति-विधि की नियामिका बन गयी थी। सम्पादन-कला द्विवेदीजी के लिए जीवन-यापन का साधन नहीं, जीवन-साधना थी। इसीलिए सम-सामयिक पत्र-पत्रिकाओं की उस अंधकारमयी रजनी में वह अपनी अप्रतिहत प्रभा से चमकनेवाली एक ही ध्रुवतारिका थी।” डाॅ. सिंह की उपर्युक्त प्रशस्ति को नीचे उद्धृत कुछ महत्त्वपूर्ण आत्मस्वीकृतियों से पूरा-पूरा समर्थन मिल जाता है:
- उस समय ’सरस्वती‘ ही एक ऐसी पत्रिका थी, जिसे भारत के सभी प्रान्तों में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। - मैथिलीशरण गुप्त
- उस हिन्दी-हीन प्रान्त में, बिना शिक्षक के ’सरस्वती‘ की प्रतियाँ लेकर पद-साधना की और हिन्दी सीखी थी। - महाकवि ’निराला‘
- अपना 50 प्रतिशत ज्ञान ’सरस्वती‘ से अर्जित किया। - रायकृष्णदास
- किसी भाषा के बारे में किसी एक व्यक्ति और एक पत्रिका ने उतना काम नहीं किया, जितना हिन्दी के बारे में इन दोनों ने किया। - राहुल सांकृत्यायन
- मेरे बाल्य-काल के अतिरिक्त-ज्ञान की एकमात्र साधिका। - बाबू गुलाबराय
- सरस्वती का चिरऋणी हूँ। - वृन्दावनलाल वर्मा
हिन्दी के प्रखर माक्र्सवादी समीक्षक डाॅ. रामविलास शर्मा तो ’सरस्वती‘ को हिन्दी की ’जातीय‘ पत्रिका मानते हैं। उनकी दृष्टि में - “सरस्वती सबसे पहले ज्ञान की पत्रिका थी, वह हिन्दी नवजागरण का मुख पत्र थी और हिन्दी-भाषी जनता की सर्वमान्य जातीय पत्रिका थी। ज्ञान की पत्रिका होने के अलावा वह कलात्मक साहित्य की पत्रिका थी, ऐसे साहित्य की जो रीतिवादी रूढ़ियों का नाश करके नवीन सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रचना जा रहा था। इसलिए उसने हिन्दी-साहित्य में और उसके बाहर व्यापक स्तर पर भारतीय साहित्य में वह प्रतिष्ठा प्राप्त की जो बीसवीं सदी में अन्य किसी पत्रिका को प्राप्त न हुई।”
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